केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों को लेकर चल रही बातचीत एक बार फिर महत्वपूर्ण दौर में पहुंच गई है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के नेताओं ने केंद्र सरकार के सामने निर्वाचित विधानसभा, मुख्यमंत्री और अधिक प्रशासनिक अधिकारों की मांग को प्रमुखता से रखा है। दोनों संगठनों ने अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण और गैर-समझौताकारी बताया है।
लद्दाख के प्रतिनिधियों की सबसे प्रमुख मांग क्षेत्र के लिए निर्वाचित विधानसभा का गठन है। प्रस्तावित व्यवस्था में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद और विधानसभा की परिकल्पना की गई है। क्षेत्रीय नेताओं का कहना है कि विधानसभा को विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार स्पष्ट रूप से दिए जाने चाहिए, ताकि स्थानीय लोगों की भागीदारी प्रशासन में बढ़ सके। साथ ही उपराज्यपाल से अपेक्षा की गई है कि वे निर्वाचित विधानसभा की सलाह के अनुसार काम करें।
नेताओं ने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की भी मांग की है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत मिलने वाली विशेष सुरक्षा जैसी व्यवस्था का सुझाव दिया गया है। क्षेत्रीय संगठनों का मानना है कि लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं।
इसके अलावा वित्तीय अधिकार, कर व्यवस्था, बजट, सरकारी खर्च और सार्वजनिक धन पर स्थानीय निर्वाचित संस्था के नियंत्रण की मांग भी रखी गई है। नेताओं ने अलग लोक सेवा आयोग तथा लद्दाख प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं के गठन की मांग भी की है।
केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत सितंबर में नई दिल्ली में आगे बढ़ने की संभावना है। फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से अंतिम संवैधानिक व्यवस्था की घोषणा नहीं हुई है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार लद्दाख वर्तमान में बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश है।
लद्दाख के नेताओं ने संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगों पर पर्याप्त प्रगति नहीं हुई तो वे छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा बहाल करने जैसी पुरानी मांगों को फिर प्रमुखता से उठा सकते हैं। ऐसे में आगामी बातचीत लद्दाख के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।