करगिल में राज्य का दर्जा देने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। स्थानीय राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम जनता ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद से उन्हें अपेक्षित राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
वर्ष 2019 में भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के तहत लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया था। उस समय इसे विकास के नए अवसरों के रूप में देखा गया था, लेकिन अब कई लोग महसूस कर रहे हैं कि इस बदलाव से उनकी राजनीतिक भागीदारी सीमित हो गई है।
करगिल के कई संगठनों ने हाल ही में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और रैलियां आयोजित की हैं, जिनमें राज्य का दर्जा या कम से कम विधानसभा की बहाली की मांग की जा रही है। उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर फैसले लेने के लिए एक निर्वाचित सरकार का होना जरूरी है।
इसके अलावा, लोगों ने रोजगार, भूमि अधिकार और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों को भी उठाया है। उनका कहना है कि राज्य का दर्जा मिलने से इन समस्याओं का बेहतर समाधान हो सकेगा।
सरकार की ओर से अभी तक इस मांग पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन बढ़ते जनदबाव के चलते इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और भी गंभीर रूप ले सकता है।
कुल मिलाकर, करगिल में राज्य के दर्जे की मांग अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है, जो क्षेत्र की राजनीति और भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।