जम्मू-कश्मीर में डिमेंशिया की बढ़ती समस्या ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लगभग हर नौ में से एक व्यक्ति डिमेंशिया से प्रभावित है। यह अनुपात देश में सबसे अधिक बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है और जम्मू-कश्मीर में वृद्ध आबादी के बढ़ते अनुपात के कारण आने वाले वर्षों में मरीजों की संख्या और बढ़ सकती है।
एक अध्ययन में जम्मू-कश्मीर के 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में डिमेंशिया की अनुमानित व्यापकता 11.04 प्रतिशत बताई गई है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा लगभग 7.43 प्रतिशत था। अध्ययन के अनुमान के अनुसार, करीब एक दशक पहले जम्मू-कश्मीर में लगभग 1.16 लाख बुजुर्ग डिमेंशिया से प्रभावित थे। यदि व्यापकता की दर में बड़ा बदलाव नहीं होता है, तो आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने के कारण वर्ष 2036 तक यह संख्या लगभग 2.53 लाख तक पहुंच सकती है।
विशेषज्ञों ने डिमेंशिया के बढ़ते खतरे के पीछे कई कारणों की ओर ध्यान दिलाया है। धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, शारीरिक गतिविधि की कमी और वायु प्रदूषण ऐसे कारक हैं जो बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2026 की अद्यतन दिशा-निर्देशों में भी इन परिवर्तनीय जोखिम कारकों पर विशेष जोर दिया गया है।
जम्मू-कश्मीर में धूम्रपान की अधिकता को लेकर भी विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। चिकित्सकों के अनुसार, धूम्रपान रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकता है और मस्तिष्क तक पर्याप्त रक्त और ऑक्सीजन पहुंचने में बाधा डाल सकता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियां भी मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं पर असर डालकर डिमेंशिया का खतरा बढ़ा सकती हैं।
बढ़ती उम्र के साथ परिवार का छोटा होना, अकेलापन और बदलती जीवनशैली भी बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच, रक्तचाप और मधुमेह पर नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी और शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में डिमेंशिया की बढ़ती चुनौती को देखते हुए शुरुआती पहचान, परामर्श और बुजुर्गों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।