केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कश्मीर विलो से बनने वाले क्रिकेट बैट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। सरकार ने कश्मीर विलो उद्योग को बढ़ावा देने के साथ-साथ इसके लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी है। इस कदम का उद्देश्य कश्मीर में निर्मित क्रिकेट बैट की विशिष्ट पहचान स्थापित करना, स्थानीय कारीगरों को आर्थिक लाभ पहुंचाना और नकली उत्पादों पर रोक लगाना है।
कश्मीर लंबे समय से उच्च गुणवत्ता वाले विलो लकड़ी के क्रिकेट बैट बनाने के लिए प्रसिद्ध रहा है। घाटी के अनंतनाग और पुलवामा सहित कई क्षेत्रों में हजारों परिवार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। यहां तैयार किए जाने वाले बैट देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में भी निर्यात किए जाते हैं। हालांकि, लंबे समय से स्थानीय उद्योग से जुड़े लोग कश्मीर विलो बैट को अलग पहचान दिलाने के लिए जीआई टैग की मांग कर रहे थे।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, जीआई टैग मिलने के बाद कश्मीर विलो से बने क्रिकेट बैट की प्रामाणिकता को कानूनी संरक्षण मिलेगा। इससे केवल निर्धारित क्षेत्र में बने उत्पाद ही “कश्मीर विलो” के नाम से बाजार में बेचे जा सकेंगे। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और स्थानीय निर्माताओं को उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कश्मीर विलो बैट की मांग बढ़ेगी। इससे निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा और स्थानीय कारीगरों, छोटे उद्योगों तथा व्यापारियों की आय में वृद्धि होगी। साथ ही युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
सरकार ने इस उद्योग को आधुनिक तकनीक, बेहतर विपणन और वैश्विक बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने की दिशा में भी योजनाएं तैयार की हैं। गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संस्थानों के सहयोग से प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जाएंगे।
उद्योग से जुड़े लोगों ने सरकार की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा है कि जीआई टैग मिलने से कश्मीर विलो क्रिकेट बैट को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर की पारंपरिक हस्तकला और खेल उद्योग को भी नया विस्तार मिलेगा।