जम्मू की एक अदालत ने वर्ष 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा और आगजनी के मामले में सात आरोपियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने पुलिस की ओर से पेश आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि केवल किसी भीड़ का हिस्सा होना किसी व्यक्ति को भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।
यह मामला पुलवामा आतंकी हमले के बाद जम्मू शहर में हुए एक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार उस समय करीब 600 से 700 लोगों की भीड़ ने पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाते हुए जुलूस निकाला था। पुलिस का आरोप था कि प्रदर्शन के दौरान स्थिति बिगड़ गई और कुछ वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया तथा छह वाहनों में आग लगा दी गई। इसके बाद कई लोगों के खिलाफ दंगा, गैरकानूनी जमावड़े और आगजनी समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
मामले में रोहित शर्मा, कैलाश कुमार, मनत कुमार, साजन कुमार, सुखदेव सिंह उर्फ रिंकू, साहिल शर्मा और जगदीश कुमार को आरोपी बनाया गया था। जांच एजेंसी ने इनकी पहचान गवाहों के बयानों और मोबाइल फोन के टावर लोकेशन के आधार पर करने का दावा किया था।
दूसरी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनूप कुमार शर्मा ने कहा कि किसी आरोपी को भीड़ द्वारा किए गए अपराध से जोड़ने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। अदालत के अनुसार यह साबित होना चाहिए कि आरोपी ने उस गैरकानूनी जमावड़े के साझा उद्देश्य में भाग लिया था। केवल यह साबित कर देना कि कोई व्यक्ति घटनास्थल के आसपास मौजूद था या भीड़ का हिस्सा था, पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय अभियोजन की ओर से पेश आरोपों को बिना स्वतंत्र न्यायिक जांच के स्वीकार करने वाला केवल औपचारिक माध्यम नहीं है। इस फैसले को आपराधिक मामलों में ठोस साक्ष्य और व्यक्तिगत भूमिका के महत्व को रेखांकित करने वाला निर्णय माना जा रहा है।